52 वर्षों से बाजार लाइन में विराजीत हो रही मांता दुर्गा
52 वर्षों से बाजार लाइन में विराजीत हो रही मांता दुर्गा समय के साथ बदलीं पीढ़ियां अब नई शुरुवात की उम्मीद युवाओं ने शुरू की थी दुर्गा उत्सव की परंपरा, आज बुजुर्गों के कंधों पर हैं यादों की विरासत कई संस्थापक सदस्य दुनिया में नहीं रहे,
52 वर्षों से बाजार लाइन में विराजीत हो रही मांता दुर्गा



समय के साथ बदलीं पीढ़ियां अब नई शुरुवात की उम्मीद
युवाओं ने शुरू की थी दुर्गा उत्सव की परंपरा,
आज बुजुर्गों के कंधों पर हैं यादों की विरासत
कई संस्थापक सदस्य दुनिया में नहीं रहे,
अब नई पीढ़ी को समिति से जोड़ने की तैयारी
सुधीर जैन और शांतिलाल ने सुनाई 52 वर्षों के सफर की कहानी
छुईखदान===नगर की बाजार लाइन में विराजित मां दुर्गा की आराधना और दुर्गा उत्सव की परंपरा को 52 वर्ष पूरे हो चुके हैं। पांच दशक से अधिक समय का यह सफर केवल धार्मिक आयोजन की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बदलाव, आपसी सहयोग और सामाजिक एकजुटता की भी मिसाल है। जिस दुर्गा उत्सव की शुरुआत कभी उत्साही युवाओं ने की थी, आज उस समिति के कई सदस्य उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां पुरानी यादें ही उनके लिए अनमोल धरोहर बन गई हैं। इनमें से कई सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई परंपरा आज भी निरंतर आगे बढ़ रही है।
बाजार लाइन दुर्गा उत्सव समिति की पहचान वर्षों से अपनी आकर्षक झांकी और मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के लिए बनी हुई है। हर साल की तरह इस बार भी झांकी और माता की मनमोहक प्रतिमा श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। उत्सव के दौरान यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए यह आयोजन आस्था के साथ-साथ पुरानी यादों को ताजा करने का अवसर भी बनता है।
समिति से जुड़े सुधीर जैन और शांतिलाल ने दुर्गा उत्सव के पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि किस तरह युवाओं ने मिलकर इस धार्मिक परंपरा की नींव रखी थी। शुरुआती दौर में उत्साह, समर्पण और सामूहिक प्रयासों से शुरू हुआ यह आयोजन आज 52 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं, साथी बिछड़ते गए और जिम्मेदारियां भी बदलती रहीं, लेकिन मां दुर्गा के प्रति आस्था और उत्सव को निरंतर जारी रखने का संकल्प कायम रहा।
==कई संस्थापक सदस्य दुनिया में नहीं रहे==
इस संबंध में था पर बताना लाजिमी होगा कि इस समिति के ऐसे सदस्य जो अपनी हाथों से झांकियों को मूर्त रूप देते थे जो इस दुनिया में नहीं रहे ।जिसमें क्रांति कुमार श्रीवास्तव भूषण श्रीवास्तव शंकर चंद्राकर प्रताप लाल गुरुजी ये ऐसे कलाकार थे।जिनके द्वारा पोट्रेट पर उकेरी गई कृतियाँ आज यकायक याद आ जाती है । जो इन मूर्धन्यों की सम्मान में एक यादगार लम्हा है ।।
===अब नई पीढ़ी को जोड़ने की तैयारी===
समिति के सदस्यों का मानना है कि किसी भी परंपरा को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी जरूरी है। उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुके पुराने सदस्यों की इच्छा है कि युवा आगे आएं और समिति की जिम्मेदारियों को संभालें। सदस्यों ने कहा कि आने वाले समय में नए सदस्यों को समिति से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा, ताकि बाजार लाइन दुर्गा उत्सव की यह गौरवशाली परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहे।समिति के बुजुर्ग सदस्य सुधीर जैन शांतिलाल जैन आज भी 74 बरस की उम्र में माता दुर्गा की सेवा में तन्मयता के साथ जुड़े है ।।
52 वर्षों का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि सच्ची आस्था, सामूहिक प्रयास और सामाजिक सहभागिता से शुरू की गई परंपराएं समय के साथ और भी मजबूत होती जाती हैं। बाजार लाइन का दुर्गा उत्सव आज भी उन्हीं पुराने साथियों के समर्पण की याद दिलाता है, जिन्होंने कभी युवावस्था में इस आयोजन की शुरुआत की थी।