जिसके हांथो से नाचने को मजबुर हो जाती थी दुनिया

-जिसके हांथो से नाचने को मजबुर हो जाती थी दुनिया -ःः-ः- उसके जैसा कोई नहीं दूजा,, क्लारनेट वादक स्व,दुखुराम कामडे़ की आज है 27 वीं पुण्यतिथि है ) छुईखदानः-आज के पाश्चात्य दुनिया में सर्व सुविधा संपन्न जमाने में डी.जे.और धमाल की छाप पर थिरकने वाले दुनिया से उलट उस जमाने में क्लारनेट और बांसुरी का जामना हुआ करता था। लोग दुर दुर से क्नारनेट को सुनने की आस में बैंड पार्टी बुलाया करते थे।उसके अभाव पर कला के प्रति उत्साही व जज्बाती और कला साधको की पीढी मे इस शहर के अंतिम छोर पर बसने वाले स्व.श्री आशाराम जी कामडे के घर पर इसी दिन एक पुत्र के जन्म लेने अवसर पर पड़ोसी महिलाएं गीत गाती थी तो पुरूष वर्ग श्री कामडे को पुनः बधाई देते हुए कुछ आयोजन करने का हठपूर्वक आग्रह कर रहे थे (जाहिर है उस जमाने मे एैसे अवसर पर लोगो के बीच खाने पीने की परंपरा आम थी) वैसे तो इस नगर मे शिक्षा साहित्य और कला की विभिन्न विधाओ के क्षेत्र मे अनेको विभूतियो ने जन्म लिया वही बच्चा जो आगे चलकर जमाने से अपने फन का लोहा मनवाया है ं

जिसके हांथो से नाचने को मजबुर हो जाती थी दुनिया

-ः-ः-जिसके हांथो से नाचने को मजबुर हो जाती थी दुनिया -ः-ः-                                            उसके जैसा कोई नहीं दूजा,,                                                   क्लारनेट वादक स्व,दुखुराम कामडे़ की आज है 27 वीं पुण्यतिथि है 

छुईखदानः-आज के पाश्चात्य दुनिया में सर्व सुविधा संपन्न जमाने में डी.जे.और धमाल की छाप पर थिरकने वाले दुनिया से उलट उस जमाने में क्लारनेट और बांसुरी का जामना हुआ करता था। लोग दुर दुर से क्नारनेट को सुनने की आस में बैंड पार्टी बुलाया करते थे।उसके अभाव पर कला के प्रति उत्साही व जज्बाती और कला साधको की पीढी मे इस शहर के अंतिम छोर पर बसने वाले स्व.

श्री आशाराम जी कामडे के घर पर इसी दिन एक पुत्र के जन्म लेने अवसर पर पड़ोसी महिलाएं गीत गाती थी तो पुरूष वर्ग श्री कामडे को पुनः बधाई देते हुए कुछ आयोजन करने का हठपूर्वक आग्रह कर रहे थे (जाहिर है उस जमाने मे एैसे अवसर पर लोगो के बीच खाने पीने की परंपरा आम थी) वैसे तो इस नगर मे शिक्षा साहित्य और कला की विभिन्न विधाओ के क्षेत्र मे अनेको विभूतियो ने जन्म लिया वही बच्चा जो आगे चलकर जमाने से अपने फन का लोहा मनवाया है ं                                                  आज इन्ही कलासाधको मे से एक संगीत साधक भी था जिसने अपनी अंगूलियो के ईशारे पर क्लारनेट जैसे जटिल वाद्य को भी थिरकने पर मजबूर कर देता था। और कालान्तर मे जब उसका जलवा संगीत कार्यक्रमो के तहत मंच मे बिख्ेारा तो लोग यह जानने को उत्सुक हो उठते थे। ेिक वह कौन है -कहां का रहने वाला है।और जब लोगो केा बताया गया कि इस जिले के संगीत साधकेा की कतार मे खडा यह चमकते सितारे का नाम दुखुराम जी कामडे है।और वो शहीद नगरी छुईखदान का बेटा है।

                 श्री दुखुराम कामडे का जन्म दिनांक 21 अप्रैल 1937 को छुईखदान के छोटे से कामड़े परिवार मे हुआ था उस अभावग्रस्त जीवन मे उन्होने पढने लिखने के साथ ही संगीत की साधना के लिए भी समय निकालते रहे और अपनी साधना को पकाने मे कोई कसूर नही छोडा फिर वह दिन भी आया जब उनकी नियुक्ति सहायक शिक्षक के रूप मे हुई और वे राजनांदगांव चले गए जहां पर उन्हे उनकी साधना के रत्नपारखी मोहन दास वैष्णव खुमान लाल साव रामकूमार दास गिरिजाप्रसाद सिन्हा भैयालाल हेडाउ जैसे संगीत के धुरंधरों से मुलाकात हुई जिन्होने उन्हे अपने साथ लेकर न जाने कितने कार्यक्रमों और सभाओं मे शामिल कर उसकी क्लारनेट का जादू बिखेरने का अवसर दिया अब तो वह भी दिन आ गया था जब लोग किसी कार्यक्रम मे यह भी पूछते थे कि कामडे जी आ रहे हैं कि नही। अपने सांगितिक जीवन काल मे उन्होने कितने ही समितियो मंडलियो सभाओ कार्यक्रमो के साथ काम किया जिसमे उस जमाने मे हाने वाले शासकीय कार्यक्रमो मे उनकी क्लारनेट की धुनो केा आज भी लोग याद करते है। आज स्व. कामड़े की 27 वीं पुण्य तिथि है।                                                                                        ,,,,,,,आज भी तलाश है,,,,,,                                          क्लारनेट को उन उंगलीयों जिसके इशारे पर वो थिरक सके।उनके पुराने मित्र और संगीत में महारथ त्रिमुर्ति रामकुमार दास.मोहन दास.राजेन्द लाल श्रीवास्तव तीनों सेवानिवृत शिक्षक एवं स्व. श्री कामड़े के सहपाठी है। वे कहते है। छुईखदान की नगरी की संगीत दुखुराम कामड़े के बीना अधुरा है।जिसे कभी भी पुरा नहीं किया जा सकता।इसीलिए छेत्रवासी कहते हैँ उसके जैसा कोई दूसरा हो नहीं सकता,,